आलेख

हिंदी की दशा और दिशा

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’

मानव को अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए एक भाषा की जरूरत पड़ती है। यद्यपि मौन मुखर होता है, पर भाषा पाकर विचार मूर्त रूप को धारण करता है। भाषा ही मनुष्य के उल्लास और पीड़ा की संवेदनाओं का एकमात्र अनुवाद नहीं होता है बल्कि भाषा वैचारिक मानस पटल पर उद्वेलित होने वाली भावनाओं का प्रतिबिंब भी होता है।
विश्व में कई भाषाएँ बोली जाती हैं; परन्तु भारत में हिंदी की अपनी सहजता और लचीलेपन के कारण संवेदनशील होने की विशेषता है।

हिंदी का इतिहास, हजारों साल पुराना है, हिंदी अपनी विकास-प्रक्रिया में एक गतिशील नदी की तरह बहती हुई, जटिलता से जूझती आगे बढ़ रही है।
यद्यपि इस बहाव में अंग्रेजी पत्थर के रूप में बाधक बन रही है।
हिंदी भाषा के साथ विडंबना रही है, कि कुछ निहित राजनीतिक स्वार्थों के चलते, कभी कभी इसकी जगह अन्य भाषाओं को खड़ा कर दिया जाता है, जिससे इसका बहाव बाधित होता रहा है।
इस स्वार्थपरता की मानसिकता तथा राष्ट्रभाषा या राजभाषा के विवाद से सबसे ज्यादा हिंदी को नुकसान पहुँचा है।
उत्तर भारत में अंग्रेजी हटाओ, तो दक्षिण भारत में हिंदी हटाओ के राजनीतिक अभियान में, भाषा कई प्रकार प्रभावित हुई।

आज के इस वैश्वीकरण के दौर में अंग्रेजी का एक ऐसा हौवा खड़ा किया जा रहा है, कि हिंदी के पक्ष में की गई हर बात को दकियानूसी विचार करार दिया जाता है।इसमें कोई संदेह नहीं, कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा है। इस भाषा के माध्यम से हम विश्व के एक बड़े हिस्से तक अपनी बात पहुँचा सकते हैं, फिर भी अंग्रेजी अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। देश-विदेश में रह रहे भारतीयों कि अस्मिता, उसकी अपनी पहचान अपनी भाषा में ही संभव है।
आज भारत में हिंदी में भी अंग्रेजी को मिलाकर हिंदी बोली जा रही है।आजादी के बाद प्रतिक्रियावादी, प्रभुत्व वर्ग की सांठ-गाँठ अंग्रेजी के अभिजनों के साथ थी, उनकी भाषा शैली में अंग्रेजी के अधिकतम उपयोग, हिंदी को सिकुड़ने के लिए बाध्य करती रही है। आज भी लोग अपनी ही भाषा-संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। वे हिंदी में बातें करना हेय समझते हैं।आज के आर्थिक विकास के दौर में जिस प्रकार हमारी भाषा, साहित्य, संस्कृति धूमिल होती दिखाई दे रही हैं; यह बेहद दुखद है, चिंतनीय है। आज के भारत को केवल भौतिक विकास की स्थिति से ही संतुष्ट नहीं होना होगा, बल्कि अपनी आंतरिक और भाषाई शक्ति को भी सुरक्षित रखना होगा।
अतः अगर हिंदी को रोजगारमुखी आयाम प्रदान किया जाय, तो अधिकतर युवा शक्ति इससे जुड़ेंगे तभी हिंदी अपनी वास्तविक प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकेगी।बल्कि सरकारी और ग़ैर सरकारी सभी संस्थानों को इसके लिए सृजनात्मक नीति तैयार करना होगा; तभी हिंदी भाषा को प्रफुल्लित और प्रसारित किया जा सकता है।
स्वतंत्र भारत में 14 सितम्बर 1949 को एक निर्णय लिया गया था, जिसमें सर्वसम्मति से यह तय हुआ था कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी और संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय रूप लेगा।इसलिए 14 सितम्बर,
हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन स्कूल, कालेजों में हिंदी के प्रति जागरूकता लाने के लिए, निबंध लेखन, वाद-विवाद आदि प्रतियोगिता का चलन शुरू किया गया। इसमें ऐसे व्यक्ति को हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार तथा हिंदी के उत्थान के लिए विशेष योगदान हेतु उन्हें सम्मान स्वरूप एक लाख रुपये देने का प्रावधान भी रखा गया, जो हर साल मनाई जाती है।
उद्देश्य यह ही है कि हिंदी जन-मन की भाषा हो, लेकिन सब कागज़ पर ही धरा है, मूर्त्तरूप देने के लिए न ही लोग और न ही देश की सरकार उत्साहित है। इस प्रकार हिंदी अपने ही घर में दासी बनकर रह गई है। हिंदी आज तक संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा नहीं बनाई जा सकी। अफसोस कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला; लेकिन हिंदी के लिए 129 देशों का समर्थन भी नहीं जुटाया जा सका। इस तरह केवल हिंदी दिवस पर हिंदी भाषा के विकास और उसके उपयोग के लाभ तथा हानि की बात करने से कुछ नहीं होगा, मात्र दिखावा बनकर रह जाएगा।
देश में कश्मीर से कन्याकुमारी तक, साक्षर से निरक्षर तक, प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति हिंदी भाषा को आसानी से बोल-समझ लेते हैं, जरूरत है इसमें थोड़ी मेहनत और प्रयास की जिससे हिंदी उनके रोजमर्रा की जरूरतों को अन्य भाषाई राज्यों, शहरों में भी पूरी कर सके। कोई भी भाषा तब और भी समृद्ध मानी जाती है, जब उसका साहित्य भी समृद्ध हो। आदिकाल से अब तक हिंदी साहित्यकारो, कवियों, विद्वानों, लेखकों एवं हिंदी प्रेमियों ने अपने उत्कृष्ट ग्रंथों, अद्वितीय रचनाओं एवं लेखों से हिंदी को समृद्ध किया है। अब हमारा कर्तव्य है, कि हम हिंदी को अपने विचारों, भावों तथा मतों के माध्यम से, विविध विधाओं के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्त करें। जिससे हिंदी और अधिक समृद्ध बन सके। जब तक हिंदी को तेजी से उड़ने के लिए हम समृद्धता को पंख नहीं देंगे, वह उड़कर देश से बाहर जाकर लोगों के जिह्वा पर कैसे बैठेगी, और कैसे भारत के समृद्धिशाली इतिहास को बताएगी, क्योंकि भविष्य की पहचान की चाभी किसी भी देश की भाषा होती है | निष्कर्ष स्वरूप में हमें याद रखना होगा कि राष्ट्रभाषा के बिना देश गूंगा होता है, इसलिये समस्त देश को हिंदी को अपनाना चाहिए और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहिए। यद्यपि सुदूर दक्षिण के राज्यों में भी अब हिन्दी प्रचार प्रसार के लिए बहुत काम हो रहा है। जिसकी प्रगति समय समय पर जन सामान्य के समक्ष आती रहती है।

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ: 11 जनवरी 2026
स्वलिखित/ मौलिक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!