
मन के भावों को शब्दों का चोला पहना,
भाषाई, व्याकरणिक लालित्य के आभूषण से सजा,थ
स्वयं ही लिख जाती है कविता,
हाँ मैं कविता लिखती हूँ।
कविता’ अंतर्मन को दे जाती है संतुष्टि के अनोखे पल।
रंगों – छंदों में समाहित, छोटे-छोटे पदबंधों में खनकती,
सभी तटबंधों औ बंधनों से परे,
पाठकों को जो हृदयंगम होती,
हाँ मैं वही कविता लिखती हूंँ।
जीवन की अनुभूतियों को समेटती,
जीने की राह दिखाती,
कुछ कर गुज़रने का सबक देती,
हाँ, मैं तो कविता लिखती हूंँ।
सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।



