
विधा : मुकरी (भोजपुरी लोककाव्य परंपरा)
कवि : श्री चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन”, गोरखपुर
समीक्षक : अरविंद शर्मा, सहायक सेवानिवृत्त महानिरीक्षक निबंधन एवं आयुक्त स्टांप
1. भूमिका
मुकरी भारतीय लोककाव्य की वह चपल और रसपूर्ण विधा है जिसमें पहेली, भ्रम और अंततः उसके समाधान का कौतुकपूर्ण विन्यास होता है। श्री चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन” की प्रस्तुत मुकरी इसी परंपरा को आधुनिक संवेदना के साथ आगे बढ़ाती है। रचना में लोकभाषा की सहजता, ग्रामीण जीवन की गंध और प्रकृति–बोध का अनूठा संगम दिखाई देता है।
2. काव्य–सौंदर्य और बिंब–योजना
कविता के आरंभिक चरण में ही कवि बादलों का मानवीकरण करते हुए अद्भुत दृश्य रचते हैं—
“उमड़ि घुमड़ि करि गाये कजरिया, नील बदन-ढ़ांपि पतुरिया,
देहियां छुइले सिहरावन लागे, नियरे सटले बिजुरी डहकावे।”
यहाँ बादल, बिजली और सावन केवल प्राकृतिक उपादान नहीं, बल्कि नारी–मन की कोमल अनुभूतियों के प्रतीक बन गए हैं। मुकरी की पारंपरिक टेक—
“ऐ सखि! सच कह मोर ह किरिया”
लोकगीत की आत्मीयता को सघन कर देती है।
दूसरे पद में सूर्य का रूपक—
“एक टांग रथ सगरि हंकाई, जउन रथी दुई नारि रखाई”
लोककल्पना की मौलिक उड़ान है। दिन–रात, उषा–संध्या के माध्यम से जीवन–चक्र को संकेतित करना कवि की गहरी सांस्कृतिक दृष्टि का प्रमाण है।
3. दार्शनिक संकेत
तीसरे और चौथे छंद में परछाईं और स्वाती नक्षत्र के माध्यम से जीवन–दर्शन मुखर होता है—
“मुंह में बनजा मोती जइसन।”
यह पंक्ति पवित्रता, संभावना और मानवीय आकांक्षा का रूपक बन जाती है। कवि लोकविश्वासों को अंधश्रद्धा की तरह नहीं, बल्कि काव्य–सत्य के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।
4. सामाजिक संवेदना
अंतिम मुकरी बेटी के ससुराल गमन की करुणा को स्पर्श करती है—
“बिटिया बसे न नइहर, चाहे ओकर साजन हो हरिहर।”
यह पंक्ति भारतीय परिवार–बोध का शाश्वत यथार्थ है। यहाँ हास–परिहास के भीतर छिपी वेदना रचना को गहराई प्रदान करती है।
5. भाषिक वैशिष्ट्य
ठेठ भोजपुरी शब्दावली की मिठास
लोकप्रचलित मुहावरों का सटीक प्रयोग
लयात्मकता और गेयता
मुकरी विधा के नियमों का अनुशासित निर्वाह—भ्रम, जिज्ञासा और अंत में चौंकाने वाला उत्तर
6. निष्कर्ष
श्री चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन” की यह मुकरी लोकचेतना की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसमें प्रकृति, गृहस्थी और अध्यात्म का त्रिवेणी संगम है। रचना यह सिद्ध करती है कि भोजपुरी काव्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति का संवाहक है। ऐसी कृतियाँ हमारी भाषायी अस्मिता को सुदृढ़ करती हैं और लोकपरंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ती हैं।
आदरणीय कवि श्री चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन” जी ने इस रचना में लोकचेतना को जिस कलात्मक ऊँचाई तक पहुँचाया है, वह उन्हें समकालीन भोजपुरी काव्य–परंपरा का सशक्त हस्ताक्षर सिद्ध करता है। ऐसी रचनाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि भाषा और संस्कृति की थाती बन जाती हैं।
समीक्षक:
अरविंद शर्मा
सेवानिवृत्त सहायक महानिरीक्षक निबंधन एवं आयुक्त स्टांप




