
तुलसी मांँ को पूज कर ,मांँग रही वरदान।
रहे स्वर्ग सम गेह मम्, बढे मान सम्मान।।
नित्य नीर अर्पण करूंँ, शीश झुका कर जोर।
बना रहे बंधन सदा, प्रेम भाव के डोर।।
शोभित मेरा अंगना, शोभित है यह गेह।
‘प्राणवायु’ तुलसी रखें, शुद्ध स्वच्छ मन देह।।
आदिकाल से पूजते , तुलसी तरु श्री मान।
हरती पीड़ा क्लेश को, करे दूर अज्ञान।।
तुलसी की जड़ पात सब, है औषध की खान ।
गुणकारी समझो इसे, कहता है विज्ञान।।
बिन तुलसी के पात सुन, बनता नहीं प्रसाद।
हर पूजन में अग्र है ,रहे बात यह याद।।
जिस घर में तुलसी नहीं, डाले डेरा रोग।
बोझ उठाते दु:ख का, न मिले सुख का भोग।
किरण कुमारी ‘वर्तनी’ जमशेदपुर




