साहित्य

निर्बल की तुम ढाल बनो

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

 

निर्बल की तुम ढाल बनो,सजग समाज के प्रहरी,
मानवता की लाज बचाओ,अबला चिंता है गहरी,
पशुता का तांडव सा दिखता,गली मोहल्ला चौराहों पर,
चीख रहीं हैं बहू बेटियां,देहात से हों या शहरी।।

हम सबकी काया निर्मात्री,मां बहन बेटियां ही होती
प्रसव से लेकर जीवन भर,हम सबको नेह संजोती
उन्हीं के संग कुकृत्य करें,क्यूं काया कट नहि गिर जाती,
जो खून तुम्हारे रग में है,शर्मिंदा आंख नही होती।।

और भी बहुत से निर्बल है,सड़क पार नहि कर पाते,
निर्वस्त्र घूमते थर थर कांपे,मदद कहीं भी न पाते,
अलाव सहारे रात काटते, सुन्न पड़ी काया सारी,
मुंह से बोल नहीं निकलता,बिन खाए-पिए उठ न पाते।।

बन जाएं सहारा इन जन का,मन से अशीश
मिल जाएगा,
तेरा होगा यश जग में,मन पुष्प अनाथ का खिल जाएगा,
अवसर मिला,सुयोग समझकर,कर लें सेवा नारायण की,
जीवन सुधर जाएगा प्राणी, औरों का मन पा जाएगा।।

अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश

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