
रोज़ की तरह पोतों को लेकर धूमने निकल गया और प्रतिदिन की तरह समीप बने मां के मंदिर मे ले गया
यही वह स्थान है मेरी कालोनी का
जहां अजीब सुख सुकून मिलता है मुझे , मंदिर के भीतर लगे हैंड पंप पर अक्सर उनके लोग पानी में पानी लेने जाते है प्रतिदिन कोई रोक टोक नहीं मां का असली दरबार मेरे पहले बच्चे के जन्म से पहले ही मेरी अद्भुत आस्था और आत्मा विश्वास है।

इस मां के निवास पर और सत् बताएं तो यह कि मेरे लिए यही तीर्थ है और यही पूजा अर्चना है जीवन में कभी भी कूच भी परेशानी हुई बस चुपचाप चला आता इस मंदिर पर दस्तक देने और सुकून पा घर आंगन में यह बार मंदिर के पास के कुछ लोग बहुत ही अच्छी तरह जानते है ओर मेरे बच्चों को भी पता है सालो से यह क्रम चल रहा है बस इतना यह मुझे बहुत बहुत सुख सुकून देता सक्रिय रखें जीवंत रखें है यह सत्य में जानता हूं
खैर साहब आज मंदिर के बाहर एक फल बेचने वाले भैया थे और उन्हें साथ आज उनका बेटा था
वह फल बेचने वाले भैया मुझे बहुत बहुत अच्छे से जानते है कभी कभी कुछ फल लेता हूं बच्चों के लिए मुझे फल खाने का शौक बिल्कुल नहीं
एक दिन फल खरीदते हुए मैने एक नोट कुछ थोड़ी बहुत कहीं से फट्टी सी देते हुएं कहां, यह कुछ फट्टी है देख लेना नहीं चला तो कल फिर आऊंगा तो आपको बदल दूंगा
वह मुस्कान लिए बोला , चंचल जी
आप झाबुआ की शान है कल ही अपकी कविता एक दैनिक समाचार पत्र में पढ़ी है आप सचमुच बहुत अच्छे इंसान है मे अक्सर पढ़ता हूं आप को सब जानते है आप को सर
उसका यह आत्मीय प्यार और स्नेह मुझे अच्छा बहुत अच्छा लगा वैसे जानता था यह मुझे रोज़ देखते है जानते होगे पर इस रिश्ते में इतनी अच्छी तरह जानते थे नहीं पिता था
खैर साहब , पोतों को मंदिर के भीतर ले गया जहां वह खुल कर खेल फोड़ लेते हैं उन्हें भी अच्छा लगता और मुझे भी सुकून मिलता
खेलते हुए मेरे पोतों को फ्री बेचने वाले भैया का बेटा बड़े ध्रुव से देख रहा था , तभी मेरे पोते ने उसे कहां
आ जा अंदर और बोल मेरी तरफ़ देखने लगा उस का बेटा भी मेरी तरफ देखने लगा , जैसे दोनों मेरी स्वीकृत चाह रहे थे, मेरे लिए यह एक परम् सुख सुकून था , मैने तुंरत हां कर दिया , फल बेचने वाले भैया का बेटा अपने पापा से पूछने लगा
उसके पापा ने भी बहुत खुश हो स्वीकृत दी और मेरी ओर देख मुस्कराए, मैने हाथ के इशारे से कहां भेज दे
उसके भीतर आते ही मेरे पोतों के और उसके चेहरे पर मुस्कान खिल आई जिसे शब्दों में बया करना संभव नहीं सचमुच बहुत बहुत खुशी थे तीनों बहुत देर खेलते रहे
जाना मुझे भी था जल्दी , जाना उस फ्लू वाले भैया को भी था जल्दी
पर बच्चों की अद्भुत खुशी और प्रसन्नता को देखते हुए बहुत अच्छा लगा रहा था
खैर साहब एक सुखद अहसास लिए अजीव खुशी महसूस करते हुए
हम बच्चों को लेकर घर आ गए और यही खुशी समेटे फल बेचने वाले भैया चल देता है
पूरे रास्ते में सोचता रहा और अपने ईश्वर से प्रार्थना करता रहा है ईश्वर
दुनिया को क्यों नहीं कुछ समझता है कैसे दुनिया कर दी तुमने सालों से सदियों से चली आ रही राम ओर रहीम मैत्री को दोस्ती को नज़र लगा दी
बहुत है समझने वाले के लिए मेरा इतना कहना ज्यादा बोलूंगा तो पता नहीं कितनों को तकलीफ़ होगी और
राजनीति के गलियारे में शोर मच जायेगा वह लेखक,,,,,,,,,,,,
प्रणाम करता हूं आज के इस सुखद अहसास कराती शाम को जब राम और रहीम का अथाह प्यार और स्नेह देखने मिला, सत् सत् वंदन बच्चों में समाहित ईश्वर को प्रणाम
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश


