साहित्य

सरसो झूमें खेत में

डॉ. पुष्पा सिंह

सरसो झूमे खेत खेत में,मौसम है ऋतु बसन्त।
मह-मह महके सभी डालियाँ,शीतलता का अन्त।

सुमन-सुमन पर तितली घूमें,नर्तन करते मोर।
गुनगुन भौंरे गूँज रहे हैं, हरियाली चहुँओर।
हलधर भाई मौज मनाते,आई खुशी अनन्त।
सरसो झूमे लहर लहर कर,आया ऋतु बसन्त।

मृदु समीर सर सर सर बहता,सुरभित लगे बयार।
शीतल करता जगती का तल,छाई सुखद बहार।
पीत वसन में धरा सजी है, दुल्हन लगे दिगंत।
सरसों झूमे लहर लहर कर,आया ऋतु बसंत।

आम्र मंजरी लदी वृक्ष पर ,कमल खिले हैं लाल।
कुहू कुहू कर कोयल कुके,सकल अवनि खुशहा
पहन बसंती वस्त्र फिरूँ मैं,आई खुशी आनन्त।
सरसों झूमे खेत खेत में, आया ऋतु बसंत।
डॉ. पुष्पा सिंह

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