
आखिरी महीना दिसंबर
आख़िरी महीना दिसंबर, कुछ इस तरह जा रहा है,
चेहरों पे जमी बर्फ को, धीरे-धीरे पिघला रहा है।
वो मुस्कान जो ओढ़ी थी लोगों ने एक लिबास की तरह,
उनका सच अब धूप की तरह, साफ़ नज़र आ रहा है।
कितनी कोशिश की थी उन्होंने, खुद को छुपाने की,
झूठे रिश्तों की बुनियाद पर, महल बनाने की।
पर सर्द रातों ने छीन ली है, वो सारी ओट उनकी,
अब ज़रूरत नहीं रही मुझे, और ठोकरें खाने की।
जो गलती की थी मैंने, हर हाथ को अपना समझने में,
जो वक्त ज़ाया किया, पत्थरों को खुदा कहने में।
वो सबक अब मुकम्मल हुआ, इस साल के ढलते ही,
सुकून मिला है अब, खुद को ही खुद में परखने में।
जाते-जाते दिसंबर, मेरा बोझ हल्का कर गया,
जो ज़हर था दिलों में, वो आँखों से भर गया।
अब नए साल की दहलीज़ पर, कोई पछतावा नहीं,
पुराना ‘मैं’ पुराने साल के साथ ही, जैसे मर गया
ज्योती वर्णवाल
नवादा(बिहार)




