साहित्य

चिरैया गौरैया

डा राजेश तिवारी मक्खन

चिरैया गौरईयां प्यारी।
कहां खो गई हमारी।।
दिखती नहीं अटा मड़वा पर,
प्रकृति की ये रचना प्यारी ।।

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ये रात को कुछ न खाये ।
कहीं घूमने भी नहि जाये ।।
बच्चों को ये सबक सिखाये ।
ठूंस ठूंस कर कभी न खाये ।।
दाने चाहे जितने डालो , पेट न करती भारी ।
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अधिक परिश्रम यह है करती ।
दिवस कहीं आराम न करती।।
केवल रात्रि में है यह सोती ।
कभी नहीं बीमार है होती ।।
हल्का फुल्का ये खाती है , आहार करें न भारी ।
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हो बीमार तो खाना छोड़े ।
पूर्ण प्रकृति से नाता जोड़ें ।।
स्वबच्चों का पालन करती ।
प्यार से पंखों में है भरती ।।
लेती प्रकृति से उतना ही , और देती शिक्षा प्यारी।।
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इसका अब तो संरक्षण हो ।
प्रयत्न करो तो संवर्धन हो ।।
दूषित प्रकृति परिवर्तन हो ।
कुकिरणों से भी रक्षणन हो ।।
ये मानव मन में तो सोचो , बड़ी है जिम्मेदारी।।
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पंछिन को दाना जल रखना ।
कृत्रिम घोंसला बना के रखना।।
वृक्षारोपण भी तुम्हें करना।
डाल पे पानी व्यवस्थित करना।।
दाना पानी देना है उन्हें , बन जा पर उपकारी ।।
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डा राजेश तिवारी मक्खन
झांसी उ प्र

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