
दर्द बढ़कर दवा ना बन जाए कहीं
मेरे दुश्मन को यह भी मंजूर नहीं!!
ख़ुदा के पास हूंँ तो यह आलम है
मुफ़्लिंसी में दिन ना गुज़र जाए कहीं!!
हजार बार जीना चाहता हूंँ
मुझे मरने पर प्यार ना आ जाए कहीं!!
ख़ुदा ने अब तक संभाल रखा है
ज़िन्दगी जी रहे हैं बस यूंँ ही!!
तुम्हारी फ़िक्र में आधे हुए हैं
इश्क़ में हम रुसवा ना हो जाए कहीं!!
मुद्दतों बाद तुम्हें पाया है
दाग़ दामन में न लग जाए कहीं!!
ज़िन्दगी में तेरी दख़्ल नहीं रखते
यूंँ ही बेरोज़गार ना रह जाए कहीं!!
तुम्हारे तंज़ से वाक़िफ़ है बहुत
अवसाद ही में चले ना जाए कहीं!!
बे-इरादा जी रहे हैं ज़िन्दगी
सहारे ग़ैर के ही ना रह जाए कहीं!!
हमारा दर्द भला कौन समझेगा
समझने में सदिया ना लग जाए कहीं…
स्वरचित – राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




