
आज क्यों आंँख में नमी सी है
लगता है जैसे चांँदनी धूली सी है!!
बहुत दिनों से तेरा इंतिज़ार था मुझको
मेरी उम्मीद परवान चढ़ी सी है!!
लफ़्ज़ों से खेलना नहीं आता हमें
वर्ना आंँखों में मेरे नमी सी है!!
हमारा दर्द ही हमारा क़ातिल है
इस दुनिया में औरों की किसको पड़ी है!!
बे-असर हो चुके हैं मेरे हौसले सारे
बीमारियां भी हमको लगी सी है!!
उनकी आंँखों में अब नज़र नहीं आते
तनहाइयां ही हमारी सगी सी है!!
रिश्ते नाते नाम के रह गए
अब तो अपने भी मेरे अजनबी है!!
लाख बुरे सही हम उनकी नज़र में
माँ की नज़र में तो उम्मीद पली है!!
ज़िंदा रहेंगे तो निभाएंगे सबसे!
अभी तो हमारी जान पर आ बनी है…
राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




