
किसे सुनायें, कौन सुनेगा,गूँगों की इस बस्ती में।
देते हैं पतवार को गाली,छेद हुआ जब कश्ती में।।
बंधुत्व मैत्रीभाव जहाँ पर,लुप्तप्राय मृतप्राय हुए।
एकाकी परिवार बढ़ रहे,अर्थहीन अभिप्राय हुए।।
वृद्धजनों की बड़ी दुर्दशा,पूत-पतोहू मस्ती में।
किसे सुनायें, कौन सुनेगा,गूँगों की इस बस्ती में।।
पाठ आचरण संस्कार के,जबसे पढ़ना बंद हुए।
आदर्शों के बंधन ढीले,सबकेसब स्वछंद हुए।।
बदमाशों से हाथ मिलाते,आरक्षी अब गश्ती में।
किसे सुनायें,कौन सुनेगा,गूँगों की इस बस्ती में।।
तनातनी तूँ तूँ मैं मैं से,दूषित अब परिवेश हुए।
बेमानी सच्चाई लगती,अपठित से उपदेश हुए।।
बेचारा बन बेबस सारे,लस्तपस्त हैं पस्ती में।
किसे सुनायें,कौन सुनेगा,गूँगों की इस बस्ती में।।
– डॉ.उदयराज मिश्र




