साहित्य

मौन- आख़िर कब तक

सुमन बिष्ट

समझदारी की कीमत अक्सर,
सबसे अधिक चुकानी होती है,
जो चुप रहकर सब सह लेता है,
उसकी सारी पीड़ा बेमानी होती है।

शब्दों से जो युद्ध न करता,
मौन रहना जिसे ज्यादा भाता है,
दुनिया उसे सुलभ समझ,
हर भार उसी पर लाद जाता है।

जो टकराव से बचता है,
उसे कायर घोषित कर देते हैं,
और जो संयम को चुनता है,
वे उसे और अधिक दर्द देते हैं।

शांत नदी को गहरा कौन जाने,
अब शोर सभी को भाता है,
जैसे खाली पात्र अधिक बजते हैं,
और भरा हुआ चुप रह जाता है।

जो हर रिश्ते को निभाने में,
खुद को हमेशा झुका लेता है,
अपने हिस्से में वो हर बार,
हमेशा के लिए त्याग लिख लेता है।

उसने समझा,विवाद व्यर्थ है,
शायद प्रेम मौन से पलता है,
पर उसे इसी समझदारी का,
हर बार मूल्य चुकाना पड़ता है।

वो टूटता है,पर दिखाता नहीं,
हर वक़्त मुस्कान ओढ़े रहता है,
सबका बोझ उठाकर भी वो,
अपना दर्द और ग़म छुपा लेता है।

लेकिन
हमेशा मौन रहना नहीं है जरूरी,
अपने विचार बताना जरूरी है,
मौन रहने से बातें टलती नहीं,
कुछ वक़्त के साथ बिगड़ जाती हैं।

बातें टालने से बढ़ती है घुटन,
दिल अफ़सोस करने लगता है,
दूसरों को कुछ बुरा न लग जाये
जब यह सोच कर भी बुरा लगता है।

मानसिक शांति के लिये ज़रूरी है
अपना पक्ष सबके समक्ष रखना
आप क्या चाहते हैं क्या इरादा है,
समझाओगे तो,उन्हें है ये समझना।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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