
आज “छत्रपति शिवा जी” की 396वीं जयंती है। जिनका व्यक्तित्व हम भारतीयों के लिए चिरकाल से अनुकरणीय रहा है और चिरन्तन भविष्य तक अनुकरणीय ही रहेगा इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। जिसने आजीवन अपने जीवन में क्रमशः सर्वोपरि राष्ट्र, गुरू, माता-पिता, परमेश्वर के बाद ही स्वयं को स्थान दिया है तो चलिए आज मैं भी उन चिर पुरातन किन्तु सदा उद्धृत श्रद्धेय के विषय में अपनी लेखनी का परिमार्जन करने का प्रयास करती हूँ -:
प्रारम्भिक परिचय-:

19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग में शिवाजी महाराज का जन्म हुआ था। माता जीजाबाई और पिताजी शाहजी भोसले थे। मुगलों की सामन्ती प्रथा और प्रजा पर किये जा रहे अत्याचारों से उनके दिल में मुगल विरोध ने बाल्यकाल से ही जन्म ले लिया था। एक छोटे से सेनापति के बेटे ने वीरता, हौसले और बुद्धिमता के बल पर बड़े मराठा साम्राज्य को खड़ा कर मुगलों को बारम्बार धूल चटाई, हिन्दवी मराठा सम्राट शिवाजी का नाम आज भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता हैं।आगत सप्ताह में ऐसे जिस वीर व्यक्तित्व का अवतरण-दिवस है। क्यों न अपने साहित्य-कला को धार देते हुए कुछ नूतन सृजन करे सुषमा,
अंतर्मन में उत्कंठा ऐसी जिसकी कोई न हो उपमा।
काव्यात्मक परिचय-:
स्वर्ण युगीन भारत में राजपाट करते भूपतियों को,
भेद गई नज़र क्रूर आतताइयों की।
महा पराक्रमी वीरों ने भारत का इतिहास रचा,
आओ देखें कैसे नव भारत का इतिहास बना!
हम प्रेम कहानी न कहकर, कहते आज ‘शिवा’ की गाथा,
जनक ‘शाहजी’,जन्मदात्री जीजाबाई।
शिवनेरी दुर्ग को जिसने निज जन्म से पावन किया,
जिसकी जननी धर्म-परायण,
वह पुत्र हुआ कर्त्तव्य-परायण।
बरछी,भाले, तीर तलवार जिसके खेल खिलौने थे,
कौशल युद्ध ,शासन प्रबंध में वे अनुपम अनोखे थे।
सब धर्मों संग नारी सम्मान शिवा हमेशा करते थे,
अभिमान मातृभूमि औ भारत पर सदा ही करते थे।
छापामार युद्ध में निपुण हुए,
नौसेना के जनक हुए।
जैसे को तैसा मजा चखा,रणनीतिकार वे गज़ब हुए।
एक मराठा सौ पर भारी, अद्भुत सबमें विश्वास भरा,
देशप्रेम औ भक्तिभाव जनमानस
में स्वाभिमान भरा।
जन्मभूमि तो अपनी है फिर मुगलों का अधिकार कहाँ?
करें गुलामी क्यों उनकी,मर मिटने को सब तैयार यहाँ।
जैसे भी हो बस युद्ध में विजयी होना ज़रूरी था,
पूर्ण स्वराज पाने के खातिर,
देना बलिदान ज़रूरी था।
गर कहीं संधि आवश्यक दिखती
झट से मित्र बना लेते,
जहाँ देखते शत्रु बली है,ओट में हो काम तमाम करते।
जय महादेव के उद्घोष के साथ
मुगलों को नाकों चने चबवाए,
चुन-चुन कर गद्दारों को मारा,
मुगलों के हाँथ कभी न आए।
कर्म-अग्नि में जिसने सर्वस्व समर्पित कर डाला,
उस महा मानव की जयंती पर करें समर्पित श्रद्धा की माला।।
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सुषमा श्रीवास्तव
रुद्रपुर, ऊधम सिंह नगर,
उत्तराखंड।



