साहित्य

चलती राहें

अरुण दिव्यांश

ये चलती हुई राहें ,
सूनसान सा डगर ,
कहीं जाना अंजाना ,
चलती राहें न बहाना ।
ये चलती हुई राहें ,
अनिश्चित सा है दूरी ,
कहाॅं मंजिल अपनी ,
पहचान करना जरूरी ।
भली हो या हो बुरी ,
सबकी अपनी मजबूरी ,
किधर कैसी मेरी राहें ,
आलिंगन को फैलाए बाॅंहें ।
किस राह को इंतजार मेरी ,
कौन सी राह मुझे प्रिय है ,
कहाॅं कौन सी चलती राहें ,
कौन सी राह निष्क्रिय है ।
करें उन राहों से परिचय ,
जो मंजिल तक पहुॅंचा दे ।
वैसा मार्ग है चुनना नहीं ,
हमको जो भी धोखा दे ‌‌।

दादा पोती
दादा पोती का प्यार देखो ,
दादा का यह दुलार देखो ,
नन्हीं सी है मासूम बच्ची ,
नन्हीं पे स्नेह अपार देखो ।
पोते पोती प्राण से प्यारा ,
पोते पोती से दादा हारा ,
पोती के स्नेह में पागल ,
पोती है ऑंखों का तारा ।
पोती संग है दौड़ लगाना ,
अपने हाथों ही खिलाना ,
निज बचपन की याद में ,
स्वयं में ही है खो जाना ।
मस्तिष्क घूमे दृश्य निज ,
समझे बचपन क्या चीज ,
खेल खेल बचपन खोया ,
बारी अब अंकुरित बीज ।

अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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