
क्षणभंगुर यह नश्वर जीवन,
जैसे रेत भरी हो मुठ्ठी में।
हर पल बीते झोंकों जैसा,
बहता जैसे जल नदिया में।
सपनों की माया छा जाती,
क्षण भर में सब खो जाता।
मुट्ठी से फिसली सांसों की,
कोई कहानी कह जाता।
न जाने किस मोड़ पे रुके,
ये प्राणों की डोर अधूरी।
संध्या की धूप सी मुस्काती,
कब ढल जाए रात अंधेरी।
हर दिन को मानो अंतिम दिन,
जियो सच्चे मन-भाव से।
ना लो बैर कभी किसी से ,
भर लो हृदय प्रेम,क्षमा भाव से।
कुछ कर्म करो जो याद रहें,
जब हम न रहें संसार में।
क्षणिक सही जीवन लेकिन,
अविनाशी है संस्कार में।
–सुमन पंत ’सुरभि’



