साहित्य

दोहा

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

तुलसी औषधि रूप हैं ,निकट न आये रोग।
जिस आंँगन पलती सदा, स्वस्थ रहें सब लोग।।

घर-घर में मांँ पूज्य है,काटें कष्ट अपार।
सेवा शुचिता में छुपा,जीवन का सब सार।।

पूजन अर्चन जो करे, करती माँ कल्याण।
तुलसी जी में है बसा,शालिग्राम का प्राण।।

पौधा ही मत मानना,सकल गुणो की खान।
भक्ति सदा इनकी करो,पूर्ण सभी अरमान।।

जिस घर इनका वास हो, पावन होता धाम‌।
महिमा अपरंम्पार है,गीता करे प्रणाम।।

प्रात काल में उठ सदा,श्रम करती बेजोड़।
धर्म-कर्म नारी करे,आलस देती छोड़।।

बच्चों को भी पालती,सुखी रखे परिवार।
ऊफ कभी करती नहीं,सहती दुःख अपार।।

कर्मठता प्रतिरूप है,करती रहती काम ।
कार्य कुशलता से करें,नारी जिसका नाम।।

जिम्मेदारी को निभा, ढोती सारा भार।
कैसी भी मुश्किल घड़ी,नहीं मानती हार।।

अब तो मानव मान ले, दुर्गा लक्ष्मी रूप।
नहीं कभी अबला रही,बन बैठी थी भूप।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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