
मुरझायी दिगंबर शाखों पर
खेतों और खलिहानों में
नव पल्लव, नव पुष्पों को
पल्लवित कर महका जाना
हे बसंत ! आओ
सुमन हृदय तो सदा बासंती है
तुम सबके मन को सुरभित कर जाना।।१
बागों में, अमराइयों में
मधुप के गुनगुन गुंजन से
कोयल के मधुर ने नवगान से
प्रकृति को झंकृत कर जाना
हे बसंत ! आओ
सुमन हृदय तो सदा बासंती है
तुम सबके मन में नव राग छेड़ जाना।।२
मदन के पुष्प बाणों से घायल
विरहअग्न से तप्त हृदय में
प्रेमातुर प्रेमी हृदय को मधुमास में
प्रणय संदेशा दे जाना
हे बसंत ! आओ
सुमन हृदय तो सदा बासंती है
तुम सबके तन मन में माधुर्य भर जाना ।।३
रीता जीवन है जिनका भावों से
प्रेम, प्रीत के रागों से
सुरभित मन के भावों से
अमर प्यार की अलख जगा जाना
हे बसंत ! आओ
सुमन ह्रदय तो सदा बासंती है
तुम सबका तन मन बासंती कर जाना।।४
सुमन बिष्ट, नोएडा




