जब रसद समाप्ति पर दिए में हो,देता प्रकाश कुछ ज्यादा,
जाड़े का भी अंत प्राय है,बर्षा करने को अति पर आमादा,
चारो तरफ अंधेरा छाया,आसार लग रहे ओले पड़ने के,
ठिठुरन बढ़ गई,बत्ती भी गुल, बर्फ़ के जैसा है पानी सादा।।
अवधेश कुमार श्रीवास्तव
जब रसद समाप्ति पर दिए में हो,देता प्रकाश कुछ ज्यादा,
जाड़े का भी अंत प्राय है,बर्षा करने को अति पर आमादा,
चारो तरफ अंधेरा छाया,आसार लग रहे ओले पड़ने के,
ठिठुरन बढ़ गई,बत्ती भी गुल, बर्फ़ के जैसा है पानी सादा।।
अवधेश कुमार श्रीवास्तव