साहित्य

करुणा की लहर: एक नन्ही जान का फर्क

सत्येन्द्र कुमार पाठक

विषय: संवेदनशीलता, निस्वार्थ सेवा और कर्म का आध्यात्मिक महत्व। समय: लगभग 30-40 मिनट। पात्र संख्या: 6 मुख्य पात्र और कुछ सहायक (मछलियों और लहरों के रूप में)।
पात्र परिचय:
दिव्यांशु (8 वर्ष): नायक, अत्यंत दयालु और संवेदनशील बालक।
प्रियांशु (3 वर्ष): दिव्यांशु का छोटा भाई, चंचल और मासूम।
पापा: व्यावहारिक और तार्किक पुरुष।
मम्मी: ममतामयी, जो समाज और संसाधनों की चिंता करती हैं।
दादाजी: ज्ञानी और मार्गदर्शक, जो आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखते हैं।
मत्स्य अवतार: भगवान का दिव्य स्वरूप (प्रकाश और ध्वनि के माध्यम से)।
पहला दृश्य: समुद्र का किनारा (प्रातः काल)
(मंच पर समुद्र के किनारे का दृश्य है। पीछे एक विशाल नारियल का वृक्ष है। मंच पर नीले और सफेद कपड़े लहरों की तरह बिछे हैं। रात को आए भीषण समुद्री तूफान के बाद हज़ारों की संख्या में नकली मछलियाँ (कागज या कपड़े की बनी) पूरी रेत पर बिखरी हुई हैं। नेपथ्य से लहरों की टकराने की आवाज़ आ रही है।)
प्रियांशु: (उछलते हुए) भैया! देखो-देखो! आज तो समुद्र ने कितनी सारी खिलौना मछलियाँ बाहर भेज दी हैं। चलो, इन्हें इकट्ठा करते हैं!
दिव्यांशु: (मछलियों के पास जाकर, दुखी स्वर में) नहीं प्रियांशु! ये खिलौने नहीं हैं। ये जीवित मछलियाँ हैं। देखो, ये कैसे तड़प रही हैं। सूरज की गर्मी इन्हें मार देगी।
प्रियांशु: (मासूमियत से) तो क्या ये अब कभी नहीं नाचेंगी भैया?
दिव्यांशु: (दृढ़ निश्चय के साथ) नहीं, मैं इन्हें मरने नहीं दूँगा।
(दिव्यांशु तेजी से झुकता है, एक मछली उठाता है और उसे समुद्र की ओर फेंकता है। वह दूसरी उठाता है, फिर तीसरी। वह पसीने से तर-बतर है, लेकिन रुकता नहीं है।)
दूसरा दृश्य: तर्क और संवेदना का टकराव
(मम्मी और पापा नारियल के वृक्ष के पास टहलते हुए आते हैं। वे दिव्यांशु को इस तरह पागलों की तरह भागते हुए देखकर हैरान रह जाते हैं।)
मम्मी: दिव्यांशु! रुक जाओ बेटा। देखो तो सही, सूरज कितना तेज चमक रहा है। तुम बीमार पड़ जाओगे।
दिव्यांशु: (भागते हुए) माँ, ये मछलियाँ मर रही हैं! मुझे इन्हें बचाना है।
पापा: (गंभीरता से) बेटा, अपनी मेहनत बर्बाद मत करो। देखो, मीलों दूर तक लाखों मछलियाँ पड़ी हैं। तुम अकेले कितनी बचा लोगे? इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।
मम्मी: हाँ बेटा, रहने दे। लाखों की संख्या में हैं, तू कितनों की जान बचाएगा? कोई फर्क नहीं पड़ता!
(यह सुनकर दिव्यांशु की आँखों में आँसू आ जाते हैं। वह एक नन्ही मछली उठाता है, उसे अपने सीने से लगाता है और पूरी ताकत से पानी में फेंक देता है।)
दिव्यांशु: (चिल्लाकर) माँ! “इसको तो फर्क पड़ता है!”
(वह दूसरी मछली उठाता है और फेंकता है।)
दिव्यांशु: और माँ, “इसको भी फर्क पड़ता है!” इसकी जान बच गई, इसके लिए तो पूरी दुनिया बदल गई न?
(मम्मी अवाक रह जाती हैं। उनके मन की ममता जाग उठती है। वे चुपचाप झुकती हैं और खुद भी मछलियाँ बचाने लगती हैं। पापा सोच में पड़ जाते हैं।)
तीसरा दृश्य: दादाजी का प्रवेश और आध्यात्मिक बोध
(दादाजी लाठी टेकते हुए आते हैं। वे इस दृश्य को देखकर शांत भाव से मुस्कुराते हैं।)
दादाजी: शाबाश दिव्यांशु! आज तुमने उस सत्य को समझ लिया जो बड़े-बड़े विद्वान नहीं समझ पाते।
पापा: पिताजी, पर क्या यह व्यवहारिक है? लाखों में से दस-बीस को बचाने से क्या होगा?
दादाजी: बेटा, यही तो भूल है। हम ‘संख्या’ गिनते हैं, लेकिन ईश्वर ‘भाव’ देखता है। शास्त्रों का निष्कर्ष यही है कि संवेदनशीलता एक दैवीय प्रवृत्ति है। मनुष्य अपने कर्मों और प्रवृत्तियों के अनुसार ही परलोक में स्थान प्राप्त करता है।
दिव्यांशु: दादाजी, क्या मेरा यह छोटा सा काम पुण्य है?
दादाजी: हाँ पुत्र! जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है, न कि भौतिक सुख। यह शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है। चाहो तो इससे ‘विभूतियाँ’ (अच्छाइयाँ) अर्जित कर लो, चाहे ‘दुर्गति’ (बुराइयाँ)। संतों की वाणी कहती है कि दया ही धर्म का मूल है।
चौथा दृश्य: मत्स्य अवतार की झलक
(अचानक मंच पर अंधेरा होता है और एक दिव्य नीला प्रकाश दिव्यांशु पर पड़ता है। शंख की ध्वनि गूँजती है।)
मत्स्य अवतार की आवाज: “हे बालक! डरो मत। मैं ही सृष्टि के कण-कण में हूँ। जब-जब जीव पर संकट आया, मैंने अवतार लिया। आज तुम्हारी करुणा में मेरा ही अंश है। जो मनुष्य एक नन्ही जान की रक्षा के लिए अपना सुख त्याग देता है, वह वास्तव में मेरी ही सेवा कर रहा है। तुम्हारा यह नेक कर्म तुम्हारे प्रारब्ध में संचित हो रहा है, जो अगले जन्मों के लिए तुम्हारे भाग्य का निर्माण करेगा।”
(प्रकाश सामान्य होता है। पापा भी अब झुककर मछलियाँ बचाने में लग जाते हैं। पूरा परिवार एक साथ सेवा में जुट जाता है।)
पाँचवा दृश्य:
(पूरा परिवार और प्रियांशु मंच के आगे आते हैं। उनके हाथों में ‘करुणा’ और ‘सेवा’ लिखे हुए प्लेकार्ड्स हैं।)
दिव्यांशु: “दोस्तों, कभी मत सोचिए कि आपका काम छोटा है।” मम्मी: “संवेदनशील होना ही हमारी असली बुद्धिमत्ता है।” पापा: “प्रकृति की रक्षा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।” दादाजी: “मनुष्य अपने आचरण से ही देवलोक या नरक का चुनाव करता है।”
सब एक साथ: “नेक कर्म करें, क्योंकि हर नन्ही जान को फर्क पड़ता है!”
(पर्दा गिरता है।)
नाटक से मिलने वाली शिक्षाएँ:
संवेदनशीलता : दूसरों के दुःख को समझना ही सबसे बड़ा गुण है।
निरंतरता: काम छोटा हो या बड़ा, अगर वह अच्छा है, तो उसे निरंतर करते रहना चाहिए।
प्रारब्ध और भाग्य: हमारे आज के नेक काम ही हमारे आने वाले कल और अगले जन्मों का आधार बनते हैं।
मानवता: शरीर का सही उपयोग आत्मिक कल्याण और परोपकार है।
सत्येन्द्र कुमार पाठक
करपी , अरवल , बिहार 804419
9472987491

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