साहित्य

नख से शिख शृंगार

डॉ अर्जुन गुप्ता 'गुंजन'

नख से शिख शृंगार, मोहिनी मूरत दमके।
कंचन काया कल्प, सुभग पूनम-सी चमके॥
अपलक रहा निहार, सजन सजनी का मुखड़ा।
जन्मों का है बंध, हुआ विस्मृत सब दुखड़ा॥

अद्भुत रूप ललाम, गमकता है नित यौवन।
चंचल चितवन चक्षु, चंद्र-सा अनुपम सौवन॥
अविरल रूप प्रभास, दीप्त हैं दोनो नैना।
लखकर ललित ललाम, बीत जाए दिन रैना॥

मधुरिम उसके बोल, चाल हिरणी सी चंचल।
होठ सजीले सौम्य, लगे तटिनी-सा अंचल॥
मनभावन मनमीत, महकता है नित जीवन।
पाकर प्रेमिल पंथ, नहीं है गम का सीवन॥

मुखमंडल का मौन, शोर करता है प्रतिपल।
अनुपम रूप शुमार, मोहता है शुचि अविचल॥
मृदु मोहक मकरंद, घोलती हो त्रिभुवन में।
सुरभित सुमन सुगंध, मुदित मादक मधुवन में॥

© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!