साहित्य

पूर्णिका

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

 

परिवर्तित आना, स्थानीय बदला है
प्रारम्भिक नेह

जिन्दगी पहले ही बदली थी घराना बदला है।
है हकीकत की कहानी, का फसाना बदला है।।

कर रहे हैं मौज मस्ती सरजमीं पर आज भी।
अब यहाँ पर तो परिंदों का ठिकाना बदला है।।

बेवजह अब मयकशी की सबको आदत हो गई।
सोचना कुछ भी नहीं है आब ओ दाना बदला है।।

राबिते दिल के हैं नाजुक प्यार से सहलाइए।
टूटे दिल पर प्यार का मरहम लगाना बदला है।।

मुफलिसों का कौन बनता है सहारा अब यहाँ।
हाँ मगर अब बेगुनाहों को बचाना बदला है।।

नींद जब आती नही अब प्यार के तो वास्ते।
प्यार में भी नींद में अब तो जगाना बदला है।।
परिचयी नेह
मौज की जद में है कश्ती हाथ देती जलकिरण।
मौज में लहरों का देखो अब बहाना बदला है।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश

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