
मेरे सर की छत थे पापा।
उम्मीदों का खत थे पापा।।
घर आंगन की शान थे पापा।
हां मेरा अभिमान थे पापा।।
ज्ञान की मीठी खान थे पापा।
सच में एक वरदान दे पापा।।
सपनों का संसार थे पापा।
करते निश्चल प्यार थे पापा।।
एक मीठी सी डाट थे पापा।
चटपटी सी चांट थे पापा।।
जीवन की मिठास थे पापा।
सबसे ज़्यादा खास थे पापा।।
प्यार की जलधार थे पापा।
मेरे लिए मझधार थे पापा।।
हर एक पल तैयार थे पापा।
सुरक्षा का हथियार थे पापा।।
ज्ञान की पाठशाला थे पापा।
प्यार की मधुशाला थे पापा।।
जीवन का श्रृंगार थे पापा।
दुश्मन को अंगार थे पापा।।
गर्मी की ठंडाई थे पापा।
सर्दी की रजाई थे पापा।।
बारिश में छाता थे पापा।
खुशीयों का खाता थे पापा।।
लेकिन जब से चले गए तुम ।
जीवन है जंगल सा पापा।।
कांधों पर जिम्मेदारी है ।
हर पल एक दंगल सा पापा।।
तुमको “सागर” बुला रहा है।
आ जाओ फिर घर में पापा।।
आंखें भीगी दिल चिल्लाया।
गए कहां तुम छोड़कर पापा।।
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मूल रचनाकार-
बेख़ौफ़ शायर डा.नरेश सागर
संस्थापक /अध्यक्ष-
कबीर साहित्य परिषद -भारत



