
हे कैलाशपति करुणामय, तुम्हारी महिमा अपरंपार,
भव-सागर से तारो हमको, करा दो मेरा बेड़ा पार।
पी कर विष तुम नीलकंठ, जग के तारणहार बने,
हर भक्त की भक्ति की, आशुतोष सदा रक्षा करे।
त्रिशूल धारी त्रिपुरारी, पाप का अंधकार मिटाओ,
भोलेनाथ दया कर तुम,सच्चा जीवन पथ दिखलाओ।
जटा से बहती गंगा धारा, पावन करे सारा संसार,
मस्तक पर चंद्र सुशोभित, बढ़ाए तेरा सिंगार।
सर्प कंठ की माला पहने नागेन्द्र, निर्भयता का सार,
भस्म रमा तन पर तुमने, किया वैराग्य का विस्तार।
अर्धनारीश्वर रूप तुम्हारा, सृष्टि का आधार,
शक्ति और शिव के संगम से, चलता यह संसार।
महाकाल तुम काल के स्वामी, समय तुम्हारा दास,
भक्त पुकारे जिस घड़ी, तुम होते उसके पास।
बद्री, केदार धाम में तुम्हारे, भक्त करते ध्यान,
कण-कण में बसे हो प्रभु, तुम हो हम भक्तों के प्राण।
सुमन बिष्ट, नोएडा




