लगे आज स्वयं के भीतर बरसों बाद लौटी आई
वही असाहय, अकेली, तन्हाई और दर्द से घिरी
बस कलम चला सुकून को खोज रही शब्दों में
लिखे शब्द पर, निरस से लगे, ना खुशी ना सुकून
खुद को तो खुद के भीतर महसूस कर लिया मैंने
पर कहां गये वो भाव, मासूमियत जो मुझमें थी
उदारता, उत्साह, वो हमेशा ही हाजिर रहना मेरा
सब के सब भाव जैसे कुचल दिए गये हों पैरों तले
मेरा खिलखिलाना चुभता रहा दूजों को अकसर
मुझे झुकाने,उदास, दर्द से घिरा देखने के लिये
किसी के जान के लाले ले भी असफल ही रहे
एक खौंफ सा पनप रहा भीतर ही भीतर दूजों के
शायद उसी खौंफ के चलते, जान ले ना लें दूजे
बुझा ना दे सांसों की महकती आवाज सरल की
वही सरलता जो मुझे बदल, पत्थर दिल बनाई
बदल गई मैं फिर भी, जिंदगी में रह गई तन्हाई।।
जीती खुद के लिये, खुद के आत्मसम्मान के लिये
सम्मान के लिये मौन धारण कर कलम चलाई।।
लगे आज स्वयं के भीतर बरसों बाद लौट आई।।2।।
डॉ वीना तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र



