
मोहब्बत है या तिजारत हमसे
क्या बात है की आफ़त है हमसे
लुटे हुए हैं हम तो तेरी राह में
पूछने हैं रास्ते लुट जाने के तुमसे
मंज़िल तो मिल जाएगी किसी दिन
रूठ कर तुम किधर जाओगे हमसे
अब तुम्हारा ऐतबार नहीं है दिल को
आख़िर क्या चाहते हो तुम हमसे
मोहब्बत तिजारत से कम नहीं होती
इश्क़ के कुछ फ़ासिले तो है हमसे
किसी दिन हम भी चले जाएंगे
दूरियां इसलिए बढ़ाई है तुमसे
एतिबार प्यार वफ़ा सब देख रहे हैं
आख़िर क्यों नहीं होंगे बर्बाद तुमसे
उफ़ ये रिश्तेदारी का मिज़ाज
थोड़ा महसूस हो रहा है हमको तुमसे
इश्क़ ना हो ना सही कोशिश तो हो
क्यों हो नाराजगी रात दिन हमसे
किसी दिन तुमसे मिलने भी आएंगे
हालांकि बहुत फ़ासिले हैं तुमसे
– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




