
आया शरण में मैं हूं बिहारीश ।।
बांह पकड़ लो ओ गिरिधारी ।।
ग्राह से गज को भी तुमने छुड़ाया ।
उसको बचाया शरण में जो आया ।।
मुझ पर भी कृपा हो जाए तुम्हारी ।
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ब्रज को भी अग्नि से तुमने बचाया ।
हुआ नाश उसका असुर जो भी आया।।
महिमा कहूं मैं कहां तक तुम्हारी ।
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सभी धर्म छोड़ो शरण में तो आओ ।
यही बात कहती है गीता बताओ ।।
अक्षौहिणी सेना 18 दिन में मारी ।
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तुम्हें छोड़कर के कहां और जाऊं ।
किसका बनूं और किसका कहाऊं।।
बहुत थक गया हूं लो अब निहारी ।
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न मुझ में है शक्ति न मुझ में है भक्ति ।
न तुम्हें छोड़ पाऊं हो कृपा ऐसी शक्ति ।।
मक्खन मन है मेरा दया हो तुम्हारी ।।
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डा राजेश तिवारी मक्खन
झांसी उ प्र




