
सिरे से
अवांछित है
हमें विकास वह ,
जहाँ धूर्त शासन है।
भ्रष्टाचार ही जहांँ ,
समृद्धि का कारण है।
जहाँ ईमानदारी ,
अक्षम्य अपराध है।
जहाँ न्याय ,
अपराधियों की ढाल है।
जहाँ अधर्म के शिकंजे में,
दम तोड़ता धर्म बेहाल है।
जहाँ व्यक्ति राष्ट्र से बड़ा है।
मूल्यों का अवमूल्यन है ।
बुद्धि विनाश का साधन ,
शक्ति परपीड़न है।
निर्मम प्रकृति दोहन है।
जहाँ हर चीख-पुकार,
अरण्य रोदन है।
स्वार्थ और शोषण है।
मृत संवेदन है।
जहाँ बुझे सपन हैं,
हर मुद्दे पर टकराव ,
और उलझन है।
नहीं चाहिए विकास ऐसा
जो सभ्यता का मरण है।
हरियाली की चिनगी,
दे सको तो दे दो इसे,
दो कुछ कतरे जीवन।
निरर्थक भटकन को
स्थायी विराम दो।
दो छलकते-बरसते
सरस करुणा कण।
आलोकित अंतर करो,
दो जग को संजीवन।
होगा सार्थक विकास तभी
जब पाएगी हर उड़ान
निरभ्र गगन ,
ज्योतित प्रांगण।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




