साहित्य

धत्त तेरी वादा की (हास्य-व्यंग्य)

जयचन्द प्रजापति 'जय'

जब पढाई का दौर होता है। लड़के लड़कियों में डाक्टर बनने का जुनून होता है तो समाज सेवा की भावना से लबालब रहते हैं। गरीबों की कोई फीस नहीं लेंगे। गरीबों का अस्पताल खुलेगा। उनकी कोई भी जांच नि;शुल्क होगी।

गरीबों की बस्तियों में मेरा अस्पताल खुलेगा। गरीबों को शहर जाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। हे भगवान! डाक्टर जरूर बनाना। मेरी मेहनत को सफलता में जरूर बदलना भगवान।

भगवानजी आपका दर्शन करने जरूर मैं आऊंगा। सवा किलो देशी घी का लड्डू चढ़ाऊंगा। आशीर्वाद ढंग से देना। एक-एक गरीब का इलाज फ्री रहेगा। आपकी कसम खाकर कह रहा हूँ।

आखिर मेहनत रंग लाई। डाक्टर बनने के सपने संजोने वाले की मेहनत रंग लायी और डाक्टर बन गये। अस्पताल गांव से दूर शहर में अस्पताल खुल गया। डाक्टरी चमक गयी।

डाक्टर साहब अब बड़का डाक्टर साहब हो गये। किसी का फीस नि:शुल्क नहीं रहेगी। ओपीडी का शुल्क में कोई छूट नहीं। जांच में कोई रियायत नहीं। सारा चार्ज जोड़कर लिया जायेगा।

किसी ने टोका कि डाक्टर साहब पढ़ाई के दौरान गरीबों का इलाज फ्री करने का आपका सपना रहा। कोई चार्ज नहीं लिया जायेगा। सम्पूर्ण इलाज फ्री रहेगा।

पढ़ाई क्या फ्री में हुई है ? लागत लगी है। जमीन बेंचकर अपना सपना पूरा किया हूँ। सारी वसूली कहां से होगी ? इन गरीबों का इलाज कर इन्ही से मोटी रकम वसूली होगी। अपने स्टाफ को आदेश दिया। कोई छूट नहीं करना है। पूरा का पूरा खर्चा जोड़ कर वसूली किया जाय। धत्त तेरी वादा की।
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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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