
गौरैया की बाट जोहता,
भरा सकोरा पानी से।
गौरैया कर गई पलायन,
जाने कब रजधानी से।।
चलनी सूप हुये सब गायब
दैनिक जीवनचर्या से।
चोकर चुन्नी नहीं दिखे अब
बदल गये दिनचर्या से।।
प्यार दिलों से गायब हैं नित
गायब मधुरिम बानी से।
गौरैया कर गई पलायन,
जाने कब रजधानी से।।
घर आँगन सब सूना लगता
लुप्त हुई है गौरैया।
जीवन शैली भिन्न हो गई
कोई नहीं है खिवैया।।
विहगवृंद सब रूठ गये हैं
मानव की मनमानी से।
गौरैया कर गई पलायन,
जाने कब रजधानी से।।
फुदक फुदक कर खेली थी नित,
आँगन और अटारी पर।
रहा बसेरा गौरैया का,
छप्पर कोना द्वारी पर।
सामाजिकता बदल गई अब,
बदल गई जजमानी से।
गौरैया कर गई पलायन,
जाने कब रजधानी से।।
© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश



