साहित्य

ग़ज़ल

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

यक़ी ख़ुद को ख़ुद से दिलाऊँ कहांँ तक‌।
मुहब्बत के नगमे सुनाऊँ कहाँ तक।।

दिखे हर तरफ अब तो है बेवफ़ाई,
दिलो जाँ किसी पर लुटाऊंँ कहाँ तक।

रही बेवसी से भरी ज़िन्दगी जो,
उसे जाके धीरज बंधाऊँ कहांँ तक।

अंँधेरे का अहसास हर पल अगर हो,
जलाकर के दीपक बुझाऊंँ कहांँ तक।

सजल नैन उल्फत भरे जब है दिखते,
छलक ही उठे वो छुपाऊंँ कहांँ तक।

कसम खाके झूठी हैं ईमान बेचें
अदा से उन्हें तब रिझाऊंँ कहांँ तक।

चढ़े फूल लाखों शहादत पे गीता,
झुका शीश सबका बताऊंँ कहाँ तक।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!