
खुशियों का संसार बसा है,आ जाओ!
माता का दरबार सजा है,आ जाओ?
जब जीवन की कठिन डगर पर कोई महिषासुर आए
आशाएं धूमिल हो जाएं,दुख के मेघ बिखर जाएं,
बूंद बूंद में स्वप्न सजाए ,अंतर्मन गाता जाए-
-ऐसा सुख संसार खिला दो,आ जाओ!
माता का दरबार सजा है,आ जाओ!
रक्तबीज बन संघर्षों के,कंटक हैं जीवन-वन में, है
लहुलुहान है सारी राहें आंसू पलते हैं मन में,
मां तुम पर विश्वास जगा है आ जाओ!
माता का दरबार सजा है,आ जाओ!
इस दुर्दिन में साथ न कोई केवल तुम ही हो मन में
मां करुणा का आंचल दे दो, महिमा तेरी त्रिभुवन में,
सजल-स्नेह का थाल सजा है,आ जाओ,!
माता का दरबार सजा है,आ जाओ,!
पद्मा मिश्रा जमशेदपुर झारखंड




