
**
जो बीत गया वह भी क्या ज़माना था।
नहीं कोई एक दूजे से अनजाना था।।
**
नमस्कार दुआ सलाम का वह एक दौर था।
हर कोई करता दूसरे की बात पर गौर था।।
हर कोई छत की धूप का होता दीवाना था।
जो बीत गया वह भी क्या ज़माना था।।
**
हर किसीका सबके घरों में आना- जाना था।
भावनाओं का बुना हुआ सारा ताना-बाना था।।
व्यवहार किसी का भी होता नहीं मनमाना था।
जो बीत गया वह भी क्या ज़माना था।।
**
शादी-ब्याह में मिल कर काम का जमाना था।
गाड़ी में मिल कर भी खाना – खिलाना था।।
आमने-सामने कभी नहींआँखों को चुराना था।
जो बीत गया वह भी क्या ज़माना था।।
**
हर दुःख-सुख को बांटने में स्वार्थ हारा था।
कहलाता कोई नहीं बसअमीरऔर बेचारा था।।
चेहरे पर नकली मुस्कान का नहीं फसाना था।
जो बीत गया वह भी क्या ज़माना था।।
**
।।एस के कपूर”श्री हंस”
बरेली।।


