
एक दिन सागर ने ईश्वर से कहा, बहुत ज्यादा खारा हो गया हूं मैं, मुझ में से नमक निकाल दीजिए।
ईश्वर चिंता में पड़ गए। सागर ने पहली बार कुछ मांगा था मना कैसे करते। लेकिन उसकी इच्छा साधारण तो नहीं थी। सागर से नमक कैसे निकालते वो। नमक से ही तो सागर का अस्तित्व है, उसकी पहचान है। नमक निकल गया अगर तो बचेगा क्या? सारे ताल तलैया, नदियाँ, झरने, कुँए सब सागर के बराबर हो जाएंगे। सब का पानी एक सा हो जाएगा। ये नमक ही तो है जो सागर को सबसे अलहदा बनाता है। धरती की तमाम नदियों का पानी आकर इसमें मिलता है फ़िर भी इसका खारापन नहीं कम होता।
ईश्वर कैसे चाहेंगे कि उनके बनाई व्यवस्था को वे ख़ुद बदलें। एक बार उसकी बात मान ली तो? अगली बार फ़िर कोई माँग लेकर खड़ा हो जाएगा सागर। उसकी देखा देखी कल पहाड़ कहने लगें कि मुझे बर्फ़ से दिक्कत है इसे हटाइए। नदियाँ गुज़ारिश करने लगें कि हम मीठे पानी की वाहक क्यों जाकर मिलें खारे सागर में तो क्या ईश्वर उनकी बात मानेंगे? धरती कहे कि क्यों मेरा ज्यादा हिस्सा सागर में डूबा हुआ है मुझे नहीं रहना ऐसे डूबकर, तो ईश्वर क्या करेंगे।
ईश्वर ने भस्मासुर, रावण जैसों की बात मान कर व्यवस्था बिगड़ते हुए देखी है। अब वो तथास्तु यूं ही नहीं कहते। सोच विचार कर निर्णय लेते हैं। हर तपस्वी को मनचाहा वरदान नहीं देते। ईश्वर ने जब मनुष्य को बनाया और असीमित बुद्धि का वरदान दिया उसके बाद से बहुत पछताए हैं। मनुष्य ने उस बुद्धि का इस्तमाल कर आकाश पाताल सब अव्यवस्थित कर दिया है। सृष्टि का जो सर्वनाश किया है उसके लिए ईश्वर के मन में आज तक अफ़सोस है।
सागर हाथ जोड़े खड़ा है कि प्रभु उसकी मांग मान लें। उसमें से नमक का वजन कम हो तो वो भी नदियों सा बह पाए। लहरों की ऊंचाई और बढ़ा पाए।
ईश्वर काफ़ी देर तक सोचने की मुद्रा में रहे। यहां से वहां चहल कदमी करते रहे। फ़िर रुककर बोले–
बड़ी कठिन मांग है तुम्हारी सागर देव। तुम्हें पता है तुममें ये नमक क्यों है? क्योंकि इस सारी सृष्टि में एक तुम ही हो जो सब प्राणियों के दुःख स्वीकारता है। कोई कहीं दूर रेगिस्तान में उदास होता है, किसी कारण से रोता है तो उसके आँसू की बूंदें आकर तुममें गिरती हैं। जब तुम्हारा जल लेकर बनने वाले बादल उस स्थान पर नहीं गिरते जहाँ लगी फ़सल को उनका इंतज़ार होता है तो उस धरती के टुकड़े से उठने वाली आह तुम में आकर लगती है। तुम और नमक से भर जाते हो। दुनिया के किसी कोने में किसी स्त्री के आंख से आँसू गिरते हैं तो वो उसके आँचल में नहीं बिखरते, वोकिसी नदी तालाब में नहीं मिलते वो तुममें आकर समा जाते हैं क्योंकि किसी में इतनी सामर्थ्य नहीं कि वो किसी स्त्री के आंसुओं का बोझ उठा पाए। इस धरती के किसी हिस्से में कोई युद्ध होता है, कोई मारकाट होती है, कहीं उपद्रव होता है तो वहाँ उठने वाले धुएं में मिलकर वहाँ के प्रताड़ित लोगों की आह तुममें आकर मिलती है। तुम थोड़े और नमकीन हो जाते हो। और तुम्हें पता नहीं कि तुम में रहने वाली हर एक मछली किसी जन्म में एक स्त्री थी। उस जन्म में कुछ इच्छाएं अधूरी रह गई उनकी, इसलिए उन्होंने मछली का जन्म लिया है। उनकी झिल्लीदार आंखों से, जिनमें पलकें नहीं होती बहने वाली हर बूंद तुम्हें और खारा बना देती है।
मैं इनमें से क्या हटाऊँ की तुम्हारा खारा पन कम हो जाए बताओ? तुम्हारा तो निर्माण हुआ ही इसलिए है कि इस सृष्टि का सारा नमक सारा दुःख, सबके आंसू तुम सम्हाल पाओ, इसलिए इस धरती का ज्यादातर हिस्सा तुममें डूबा हुआ है। मैं तुम्हें वचन तो नहीं दे सकता लेकिन यह आश्वासन अवश्य दे सकता हूं कि जिस दिन इस धरती पर किसी स्त्री की कोई इच्छा कोई कामना अधूरी नहीं रहेगी उस दिन से तुम्हारा खारा पन कम होने लगेगा।
सागर बड़ा उदास हुआ कि ईश्वर से उसने पहली बार कुछ मांगा और उसे खाली हाथ वापस लौटा दिया उन्होंने। ईश्वर को प्रणाम कर वो पीछे पलटा तो उसने देखा अनगिनत मछलियाँ सतह पर आकर उसकी ओर देख रही हैं।
©संजय मृदुल
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