साहित्य

किस क़दर टूटा हूँ

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

किस क़दर टूटा हूँ, तुमको क्या बताऊँ,
जिस्म छलनी छलनी, तुमको कैसे बताऊँ?

जबसे दिलाया याद, वादा मोहब्बत का,
और वास्ता दिया था, मेरी मोहब्बत का।
तबसे खुद को ही भुलाकर जी रहा हूँ,
याद रहा क़िस्सा, बस तेरी मोहब्बत का।

याद जब जब आयी बिस्तर चुभने लगा,
ज़ख़्म दिल पर कितने लगे कैसे बताऊँ?

उस गली जाना भी मैंने छोड़ दिया, तेरा मकां था,
जाता नहीं उस छत पर अब, दिखता तेरा मकां था।
सर्दियों की दोपहर, गुनगुनी धूप में मिलने की चाह,
वह बगीचा आम का याद आता, जहाँ तेरा मकां था।

तुम कहाँ कैसी हो नहीं जानता, याद भी करता नही,
रोज़ सुबह हिचकी आती तेरी, तुमको कैसे बताऊँ?

तेरी चाहत में लिखे गीत, हो गये डायरी में क़ैद,
कब मिलेगी उनको राहत, जिनको सज़ा उम्र क़ैद?
पर बता कम्बख़्त बग़ावती अहसासों का क्या करें
आँसुओं का सैलाब बन, तोड़ने को वादों की क़ैद।

इश्क़ करने की सज़ा मुझको मिली कितनी हसीं,
शुष्क नयन दिल रोता, लब पर हँसी कैसे बताऊँ?

ख़्वाब में भी बस चेहरा तुम्हारा मुझे भाता है,
मिलते थे तन्हाई में, वो मंज़र याद आता है।
शर्मो हया से झुके नयन, आकर लिपटना,
उसी की अहसास में, जीवन गुजर जाता है।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

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