साहित्य

नारी और समाज

सुमन बिष्ट

नारी की स्थिति का कोई एक पहलू नहीं है आज
समय और समाज ने दिए हैं उसे अगणित घाव।
इतिहास की धूल में दबी वो एक आवाज़ है,
जो आज भी भविष्य से करती संवाद है।

कभी देवी कह पूजी गई,कभी धिक्कारी गयी,
कभी अपने घर की चौखट में ही सिमटी रही।
संस्कृति के नाम पर बंधी बंधनों की डोर,
कई सपने थे उसकी आँखों में,पर राहें थीं कठोर।

शिक्षा ने दी उसे उड़ान की पहली राह,
अक्षर बने दीपक, मिटा अज्ञान का अंधकार।
कलम से खुलने लगा उसके लिए नया जहां ,
उसकी नयी सोच ने तोड़ा सदियों पुराना विधान।

रोज़गार ने दी उसके आत्मसम्मान को पहचान,
अपने निर्णय करने पर मिला अधिकार का मान।
आर्थिक स्वतंत्रता बनी शक्ति की ढाल,
अब “सहारा” नहीं, वह खुद बनी मिसाल।

पर रूढ़िवादिता की जड़ें अब भी हैं गहरी,
परंपरा की दीवारें आज भी हैं वहीं पर ठहरी।
उसके कदम कदम पर बैठे हैं पहरेदार,
नारी से आज भी मांगा जाता है हिसाब बार-बार।

कानून ने दिए हैं उसे मौलिक अधिकार,
न्याय की उम्मीद से जगी है नई आस।
कानून से चाहिए नेकनियत और न्याय,
सोच बदलेंगे तभी बदलेगी जनमानस की राय।

जब शिक्षा, समानता, सम्मान बनेंगे आधार,
तभी नारी को मिलेगा असल में अधिकार।
नारी तरक़्क़ी करेगी तो तरक़्क़ी करेगा समाज,
यही देश के विकास की सच्चाई है आज।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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