साहित्य

अब श्रम का जय गान करो

वीणा गुप्त

देखो उसे,
श्रमिक है वह,
हाथ- पैरों से अपने,
भविष्य हमारा गढ़ता है।
पथरीली राहों पर चलता,
तनिक भी न डरता है।
छैनी,हथौड़ी,हंसिया,
हल और कुदाल का,
अनुपम साज ले,
उसे अनवरत,
पत्थर,लोहे,माटी पर,
बजाता है।

यह उसका ही दम खम है,
जो तराश पाता है,
मनहर प्रतिमाएं,
कलाकृतियाँ।
उड़ते पुष्पक,
भव्य इमारतें।
समुद्र सेतु,
रेशम की सलवटें।
जीवन की मिठास,
पर्व की उमंग,
हरियाली की हँसी,
झिलमिलाते से रंग।

आज का भगीरथ यह,
प्रतिबद्ध है ,
विकास गंगा को,
पहुँचाने शीर्ष पर।
ताप में तपकर ,
शीत में ठिठुर कर,
हमारे लिए ,
मल्हार गाता है,
अपनी झोंपड़ी के ,
टपकते छप्पर को,
राम भरोसे छोड़,
हमारा सावन सजाता है।

सुदृढ़ नींव है वह ,
समाज और देश की।
सुविधा-समृद्धि की,
लिखता परिभाषा है।
वंचित,विपन्न वह,
जीवन उसका विद्रूप,
मरुतृषा की दुराशा है।

अकृतज्ञ हम कितने,
उसकी भागीदारी के प्रति,
जो उसकी भूख और प्यास
को बखूबी जानते तो हैं,
पर  उसके समाधान की
नीयत नहीं रखते।
मिथ्या आश्वासनों के
हमारे ये झुनझुने,
उनकी पीड़ा नहीं हरते।

पता है न हर चुप्पी,
एक दिन चीखती ही है।
हर नींद आँखें खोलती ही है।
भूख कुलबुलाती है जब ,
तब हर मूल्य का ,
अवसान होता है।
चुप्पी का चीखना ही,
विप्लव गान होता है।।

छैनी हथौड़ी को,
मत करो मज़बूर ।
जीना हक है सबका ।
पाएं सब अपने श्रम का,
प्रतिफल पूरा भरपूर।
गोपालक के उपासक हो,
श्रम का सम्मान करो।
खाई पाटो विषमता की,
मानवता का जयगान करो।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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