
हाथ में छाले
पसीने से भीगी कमीज़
ईंट गारे संग
सपने बुनता मज़दूर
धूप छाँव सब
सहता रोज़ बिना थके
बच्चों की खातिर
रोटी कमाता है वो
कभी ना रुका
मेहनत उसकी पूजा
हर पल गीत गाता
खुद को मजबूत बनाता
कड़ी धूप में बढ़ता
कोमल हाथ सख्त हुए
साथ हौसला रखता
पूरा दिन काम करे
दो रुपए घर लाता
पर घर चलता नहीं
फिर भी सुबह उठे
सपने बुनता मज़दूर ।।
रिया राणावत
कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)




