
लपटों के बीच खड़ी एक परछाई,
दोनों हाथ उठे, जैसे दुआ या दुहाई।
नारंगी शोलों का समंदर उबलता,
पर वो सिर उठाए, कुछ कहता, कुछ जलता।
ये आग क्या है? पीड़ा का अंबार,
या वो अन्याय जो रोज़ सहती हर बार।
ये चीख़ है या हुंकार का उद्घोष,
ख़ामोशी की दीवार तोड़ता आक्रोश।
जला दो मुझे, पर राख न समझना,
हर कण से मैं फिर से जन्म लूँगी।
हर ज्वाला जो तन को छूती है,
वो आत्मा को और कुंदन करती है।
ये दहन नहीं, ये तपस्या है मेरी,
अपने हक़ की, अस्तित्व की पहरेदारी।
आग से डरती नहीं अब ये नारी,
क्योंकि आग से ही तो बनती है चिंगारी।
हाथ उठे हैं माँगने को नहीं,
ये एलान है बदलने का, झुकने का नहीं।
लपटों को चीर कर निकलेगी एक रौशनी,
जो लिखेगी नई कहानी, नई ज़िंदगानी। डॉ.अनीता निधि जमशेदपुर, झारखंड




