साहित्य

कर्म, चेतना और आंतरिक स्वतंत्रता

सुनील कुमार महला

जीवन का सबसे बड़ा और सच्चा संदेश यह है कि हमें इस संसार में रहते हुए भी उससे चिपकना नहीं चाहिए। काम करना हमारा धर्म है, लेकिन काम का बोझ मन पर रखना जरूरी नहीं। जो भी काम करें, उसे प्रेम, सच्चाई और पूरी निष्ठा से करें। काम पूरा हो जाए, तो उसे ईश्वर को सौंपकर आगे बढ़ जाएँ। बीते हुए कार्य को पकड़े न रहें और नए कार्य को सहज भाव से स्वीकार करें।

जैसे यात्रा में ज्यादा सामान होने से रास्ता कठिन हो जाता है, वैसे ही जीवन में जरूरत से ज्यादा इच्छाएँ, मोह और अहंकार हमारे मन को भारी बना देते हैं। यही भारीपन तनाव, चिंता और अशांति पैदा करता है। इतिहास बताता है कि बड़े-बड़े राजा और विजेता भी अंत समय में शांत नहीं रह पाए, क्योंकि वे धन, शक्ति और अहंकार से बंधे रहे। सिकंदर महान ने पूरी दुनिया जीत ली, लेकिन मृत्यु के समय वह भी कुछ साथ नहीं ले जा सका। इससे हमें समझना चाहिए कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है।

निर्लिप्तता का मतलब यह नहीं है कि हम जीवन से दूर भागें। इसका अर्थ है जीवन को सही समझ के साथ जीना। जब हम किसी चीज से ज्यादा चिपक जाते हैं, तो मन भारी हो जाता है। लेकिन जब हम छोड़ना सीख लेते हैं, तो मन हल्का और शांत हो जाता है। यह अवस्था धीरे-धीरे जागरूकता से आती है। जागरूकता से संकल्प बनता है और संकल्प से भीतर की स्वतंत्रता मिलती है।

हम सभी इस संसार में यात्री हैं। जैसे यात्रा में कुछ लोग थोड़ी दूर तक साथ चलते हैं और फिर अलग हो जाते हैं, वैसे ही जीवन के रिश्ते, सुख-दुःख और परिस्थितियाँ भी हमेशा नहीं रहतीं। हमें प्रेम करना चाहिए, सीखना चाहिए और बाँटना चाहिए, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि एक दिन सबको विदा होना है। जब यह बात डर नहीं, समझ बन जाती है, तब जीवन आसान और स्पष्ट हो जाता है।

जिस तरह हम फिल्म देखते समय जानते हैं कि वह असली नहीं है, फिर भी उसका आनंद लेते हैं, उसी तरह जीवन को भी एक खेल या लीला की तरह देखें। उससे अपनी पहचान न जोड़ें, बस उसे समझते हुए जीएँ। ऐसा करने वाला व्यक्ति जीवन में भी शांत रहता है और मृत्यु के सत्य को भी सहजता से स्वीकार कर लेता है।

 

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।

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