साहित्य

ढूँढ रहा हूँ अपना बचपन

डॉ. अर्जुन गुप्ता

सरपट दौड़ लगाता अविरल,

समय सदा छुटकारे में।

ढूँढ रहा हूँ अपना बचपन,

यादों के गलियारे में॥

 

जानें कब वह बचपन बीता,

मदमाता यौवन आया।

खेल खिलौने गुड्डे गुड़िया,

सब छूटे मन भरमाया॥

तरुणाई सरगम में डूबा,

जीवन के चौबारे में।

ढूँढ रहा हूँ अपना बचपन,

यादों के गलियारे में॥

 

तरुणाई के बाद अवस्था,

आया जिम्मेदारी का।

सत्कर्मों के साथ निभाया,

अपनी हिस्सेदारी का॥

नवयौवन में कर्तव्यों को,

ढोया है स्वीकारे में।

ढूँढ रहा हूँ अपना बचपन,

यादों के गलियारे में॥

 

बीता यौवन है बालिगपन,

ईश्वर में मन डूबा है।

भजन प्रार्थना ईश वंदना,

रचना का मंसूबा है॥

सोच रहा मन बाकी जीवन,

बीते भाईचारे में।

ढूँढ रहा हूँ अपना बचपन,

यादों के गलियारे में॥

 

© डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

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