
आँगन की धूप तपी है, झुलस रहा है बाग़,
चिड़िया की चोंच सूखी है, प्यासा है कुत्ते का मुख।
गिलहरी भी थकी बैठी, पेड़ की छाँव पर तले,
तब मिट्टी का परिंडा बोला, “आओ, यहीं ठहरो पल।”
न कोई जात पूछता, न कोई नाम यहाँ,
चोंच हो या पंजा, सबकी प्यास एक समान।
गौरैया चहक-चहक पीती, कुत्ता लपक-लपक लेता,
गिलहरी झुक-झुक पीती, मिट्टी भी मुस्काता है।
इंसान ने रखा है ये, दया का छोटा प्याला,
पुण्य नहीं ये कोई, बस जीने का हवाला।
कि जब सृष्टि प्यासे हों, तो छाया और जल देना,
यही सबसे बड़ा धर्म है, यही सच्चा वंदन।
इस चित्र से हमको मिली सीख बड़ी गहरी है, इन बेज़ुबानों की प्यास बुझे, जिंदगी खिलती है
मिट्टी का परिंडा भरा रखो, गर्मी हो या सावन,
प्यास बुझाना सीखो, तो देवता बसें आँगन।
डॉ.अनिता निधि जमशेदपुर, झारखंड




