साहित्य

आधे अधूरे ख्वाब

शशि कांत

लेकर चले थे कुछ ख्वाब

आधे अधूरे से…!

कुछ सपनों के उड़ जाने के बाद भी,

मन ने हार नहीं मानी -और,

थी,आँखों में इक आस अभी भी,

उस नीले अम्बर को छूकर आने को,

वक़्त की तेज़ हवाओं ने,

सपनों की राहों को मोड़ा,

आशा के पँख झुकाये थे,

पर….,

हर ठोकर ने यही सिखाया,

आशा की लौ को बुझने ना देना,

हर रात के बाद सुबह सजी है,

अधूरे ख्वाब पुकार रहे हैं…!

“हिम्मत से तुम कदम बढ़ाओ”

जो कल छूटा था,आज सँभालो,

भाग्य विधाता स्वयं बनो -तुम,

कुछ सपनों के उड़ जाने के बाद भी,

मंज़िल उनको मिल जाती है,

जो थककर भी रुकते कभी नहीं,

आधे अधूरे ख्वाब एक दिन,

पूर्ण हुए बिन झुकते नहीं,

इसलिए तुम सपनों से रिश्ता,

हर पल दिल में जीवित रखो,

जो आज अधूरे से लगते हैं,

कल की जीत समझकर तुम रखो उसे ||

 

*शशि कांत श्रीवास्तव*

डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

स्वरचित मौलिक रचना

30-06-2026

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