
कभी किसी से अब नहीं, मिलते आज विचार।
अपने ही खाने लगे,अपनों से जब खार।
कैसा हुआ समाज है,समझ न आई बात,
पैसों के खातिर जहांँ, टूट रहे परिवार।।
आध्यात्मिक से दूर रह,करते नित तकरार।
छोटी-छोटी बात पर ,पहुंँच कचहरी द्वार,
अपनों के प्रति ही रहे,थाने रपट लिखाय,
घर-घर का लेखा यही,बदल गए व्यवहार।।
नई सोच भारत नया,इस पर हो संवाद।
नवल क्रांति लाएँ युवा,तभी मिटे अवसाद।
जागृत करें समाज को,रोकें भ्रष्टाचार,
खुशियांँ पहुंँचे द्वार तब,जन-जन में आह्लाद।।
मिटे सभी अज्ञानता,भरें ज्ञान का सार।
अहम् भाव उपजे नहीं,सत्य धर्म आधार।
रिश्तो के प्रति प्रेम हो,चाटुकारिता दूर,
विनय यही गीता करे,करिए प्रभु स्वीकार।।
डॉ गीता पांडेयअपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




