साहित्य

गरजे बदरिया

पार्वती देवी

घनन घनन कर,गरजे बदरिया

सनन-सनन चलती पुरवैया

चमक चमक कर चमके बिजुरिया

सावन की रुत आई सखी री!

सावन की रुत आई।२

 

देखो बदरवा बरस रहे हैं

हमरो जियरवा तरस रहे हैं

अबहूँ ना साजन घर आये

हमको बहुत सताये सखी री!

साजन ना घर आये।२

 

विरह जिया में अगन लगाये

टेर पपिहरा शोर मचाये

डाँसल सेज कांँट सम लागे

बहुत हमें तड़पाये सखी री!

साजन ना घर आये। २

 

पावस की रुत आयी जबसे

पापी मदन अधिक सताये

घड़ी-घड़ी, युगों सम लागे

जियरा बहुत जरावे सखी री!

पावस बहुत रुलाये।२

 

कोयल बैरन हुई बहुत है

कुहुकि के हमको चिढ़ावे

उल्ह-मेल भई सेजिया पर

रतिया नींद न आवे सखी री!

सावन बहुत रोवाये।२

पार्वती देवी गौरा देवरिया

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