साहित्य

मेरे गालों पे ढलते आँसू

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

मेरे गालों पे ढलते आँसू, मौन कथा कह जाते हैं,

अंतर के सूने आँगन में, दीप विरह के जल जाते हैं।

 

हँसी ओढ़कर जीती आँखें, पीड़ा भीतर भरती हैं,

निशदिन बहते भाव हृदय के, शब्द कहाँ कुछ करते हैं।

 

सपनों की टूटी पगडंडी, स्मृतियों से भर जाती है,

हर एक बूँद में जीवन की, थकी कहानी गाती है।

 

सह लेती हूँ चुप रहकर मैं, दुख का भारी यह सागर,

मेरे गालों पे ढलते आँसू, बन जाते हैं आत्म-सागर।

 

मेरे गालों पे ढलते आँसू, चुपके से कुछ कह जाते,

अनकहे से भाव हृदय के, नीरव स्वर में बह जाते।

 

पीड़ा की हर एक रेखा, पलकों पर लिख जाती है,

भीतर छुपी वेदनाएँ, बाहर राह बनाती है।

 

संसार हँसी के मुखौटे, ओढ़े रोज़ गुजरता है,

दर्द मगर इन आँसुओं में, सच्चा रूप सँवरता है।

 

मेरे गालों पे ढलते आँसू, धीरज का दीप जलाते,

टूटे मन को जोड़-जोड़कर, फिर से जीना सिखलाते।

 

स्वरचित

डाॅ सुमन मेहरोत्र

मुजफ्फरपुर, बिहार

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