
भरोसा कांच जैसा था जिसे उसने तोड़ा है,
दगाबाजों ने अक्सर बीच भंवर में छोड़ा है।
दिखाते हैं जो सबवेंजो में चोखा प्यार का चश्मा,
वही पीछे से खंजर घोपकर महफिल सजाते हैं,
जुबा पर शहद रखते हैं दिलों में जहर होता है,
इनकी मीठी बातों का ही सबसे बड़ा कहर होता है।
कभी जो जान कहते थे वो अनजान बैठे हैं,
लूटकर आशियाना मेरा, वो मेहमान बैठे हैं।
बदलते रंग वो ऐसे जैसे मौसम बदलता है,
दगाबाजों के साए में भरोसा रोज जलता है।
सबक ये दे गया कोई कभी अंधा यकीन मत करना,
जो कल तक सिर्फ मेरा था, वो अब हर किसी का आईना।
गिरा मुखौटा चेहरे से तो असली रूप सामने आया,
दगाबाजों की इस दुनिया में “आकाश” ने अब संभालना सीखा।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




