साहित्य

संस्मरण  माँ

डॉ. प्रभा जैन

प्रात: की इस बेला में

याद आई मोहण्ड वाली माँ,

प्रसिद्ध है वो बहुत देहरादून में

सब कहते डांट वाली माँ।

 

सुनती सबकी, दुःख हर लेती

जाता कोई दून से बाहर,

रास्ता है वहीं एक पहाड़ पर

बस लें जाती दर्शन करा।

 

रहती मैं कहीं भी

याद माँ की आती,

आती जब देहरादून मैं

दर्शन करने अवश्य जाती।

 

व्यतीत हुआ अभी थोड़ा समय

जाना हुआ दर्शन करने माँ का

जय माँ-जय माँ कहती जाती

एक-एक कदम आगे बढाती जाती।

 

था रविवार भीड़ बहुत भारी

दर्शनार्थी दर्शन कर बढ़ रहे आगे,

मैं भी दर्शन कर ले प्रसाद

अभी बढ़ाये दो चार कदम आगे।

 

लगा जैसे सिर पर रखा हाथ

घूम देखा,आस-पास कोई नहीं

ऊपर देखा झूमर लटकते- हिलते

हाथ का एहसास साफ था महसूस।

 

किया फिर से प्रणाम माँ को

है वो शक्ति-शक्ति निराली,

आस-विश्वास देती सबको माँ

पूर्ण करती सबका विश्वास।

 

कर जोड़ कर खड़ी मैं

लौट वापस माँ के पास,

सदा रहो माँ संग हमारे

सबकी आशा पूर्ण करो माँ।

 

है यह संस्मरण जो

याद बन छा रहा मन पर,

मिले आशीर्वाद सभी को

माँ करें निवास सबके मन अंतस में।

 

स्वरचित

डॉ. प्रभा जैन “श्री ”

देहरादून

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