साहित्य

लघुकथा हास्य-व्यंग्य

डॉमंजु गुप्ता

आधुनिकता के रंग में रंगी चौदह साल की बेटी ने माँ को बताया –

माँ! ब्यूटीपार्लर में जाने से रंग-रूप है निखर जाता।

सुन के माँ ने बेटी को देशी नुस्खा बताया ।

सेल्फ मेड आयुर्वेदिक उबटन बना के दिखाया।

इस में क्या है माँ! भावुकता से बेटी ने पूछा।

 

लाडो! इसमें हल्दी, मलाई, केसर, बेसन, शहद है और अपने चेहरे पर लगा के मुँह को था धोया।रंग चेहरा का साफ -दमक रहा था।

 

भोली बेटी माँ से बोली – “माँ यह तो ब्लीचिंग कर डाली।”

“हा।”

पुनः बेटी ने जिज्ञासा से पूछा –

“मसाज, स्टीम कैसे हैं करते?”

 

मसाज हेतु माँ ने खुशी-खुशी मुँह पर मलाई लगा के

हल्के से हाथों से मालिश कर के दिखाया।

अरे माँ! तुम्हारा चेहरा चमकदार हो गया। ग्लो आ गया।

फिर माँ ने उबले चावल के माड़ पर भाप ले के दिखाया।

लाडली यूँ बोली ,”माँ! यह तो स्टीम हुई

चेहरे का रोम-रोम खुल गया।”

बेटी को देसी नुस्खा नहीं भाया

माँ से फिर बोली –

“कटरीना-करीना तो ब्यूटीपार्लर में

थ्रेडिंग, फेशियल, क्लीन-अप न जाने क्या -क्या करातीं हैं ?”

“हा, वे हजारों रुपये का खर्चा करके तब लुभावने विज्ञापनों के लिए फोटो खिंचवातीं हैं।”

“लगती तो खूबसूरत हैं।”

माँ बेटी को दिलासा दे रसोई से फेसपैक’ बना के लाई ,इसे लगा के देख।

उसने मुँह पर पोत लिया। फिर धोया।

आईना में चेहरा देखा गुस्से में बोली – “माँ! ये तो मुल्तानी मिट्टी है, मटियाला रंग करा दिया तुमने।”

 

हँसते हुए माँ – ” अरी! यही ‘मड-थेरेपी’ है। पार्लर में दो हजार रुपये की है। घर में मुफ्त! ”

नहीं माँ सुन –”5 हजार रुपये दो। पार्टी में क्लासमेट को चुल करूँगी।”

” यह लो नोट, तू खुश …।”

फेशियल , स्टीम , मसाज कराके घर पर आई।

माँ बेटी को विस्मित हो के ताक रही थी

बेटी का चेहरा काना बैंगन की तरह काले – काले धब्बों से भर गया।

बेटी ! तूने यह क्या कर डाला ?

चौदहवीं के चाँद पर आज अमावस ने डाका डाला

रुआँसी बेटी बोली ,

“नोसिखिए अंडरट्रेनर ने स्टीम … र से भा .. प ज्यादा दे डाली।धब्बों की कालिमा बिछा डाली ।

फेसपेक ने एलर्जी कर डाली ।”

माथा पीटते हुए माँ बोली

“आधुनिकता पर धब्बा लगा दिया।पाँच हजार पर चूना लगा दिया।”

“ओह !”

तभी पड़ोसिन पार्लर वाली ‘ग्लैमर आंटी’ फेशियल किट लेकर आई । माँ को देते हुए – “दीदी, आपसे ही तो सीख के मैंने पार्लर खोला। उबटन वाला फॉर्मूला ‘दादी ब्रांड’से पेटेंट करा लिया है।”

“अच्छा!”

” धब्बे मिटानेवाला दही वाला एंटीऑक्सीडेंट पोच दे दो।”

“यह लीजिए।”

बेटी हक्की- बक्की हो बोली,” आंटी , ‘दादी ब्रांड’ तो मेरी सहेलियों…।”

“हा, जहाँ केमिकल नहीं हर्बल -देसी परंपरा की केमिस्ट्री होती है। !”

 

डॉमंजु गुप्ता

वाशी , नवी मुंबई

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