साहित्य

दुनिया की भीड़

मधु वशिष्ठ

अपना अर्थ तलाश रहा हूं,
खुद ही खुद से भाग रहा हूं।
खो गया हूं इस संसार की भीड़ में,
हर रास्ते को ताक रहा हूं।

लड़कपन से बड़प्पन आने तक,
जीवन में यूं ही भाग रहा हूं।
कुछ छूटे, कुछ पकड़े रिश्ते,
जाने किसके पीछे, किसके आगे भाग रहा हूं।

खुद ही खुद को तलाश रहा हूं,
अनदेखे, अनजाने रास्तों पर।
खुद को लेकर जाग रहा हूं,
मन आगे दौड़ा जाता है, मैं मन के पीछे भाग रहा हूं।

बुद्धि, विवेक कभी खो जाते,
मैं मोह, लोभ में झांक रहा हूं।
आकर खो गया दुनिया की भीड़ में,
मैं यूं ही उम्र को फांक रहा हूं।

इस दुनिया से पहले कहां था मैं?
दुनिया से परे में झांक रहा हूं।
अनेक प्रश्न जो हवा में बैठे,
उन सब का अर्थ मैं तलाश रहा हूं।

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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